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मताधिकार

वर्डप्रेस के घाट पर हुई मतों की भीड़….

ओपीनियन, बोले तो मतों का जनतंत्र में और गॉसिप मैग्ज़ीन्स में बड़ा महत्व है। दोनों में फ़र्क क्या है? पहले में आप जिम्मेदारी से भरा एक महत्वपूर्ण चुनाव करते हैं जो विवाह की तरह ही आपके जीवन को प्रभावित करने वाला है तो दूसरे में आपकी मनोग्रंथियाँ उड़ान भरती हैं। फिर किसी ने कहा है कि जनतंत्र मूर्खों की सरकार है ! आप मानें ना मानें पर जहाँ इतने भिन्न-भिन्न मतों वाले मतदाता हों वहाँ मूर्ख बनने में बड़ा मज़ा आता है! इसमें ज़रूर कोई (कई) फायदा(दे) भी है वरना हमारे यहाँ नेता बनने की ऐसी होड़ न होती! और इन्हें बनाने वालों ने किस चीज का इस्तेमाल किया होगा? दिमाग का?…शायद दिमाग के ही किसी हिस्से का..! अमाँ छोड़ो यार! ये दिमाग नाम की शै मेरे पल्ले तो कभी पड़ी नहीं।

हाँ, तो मुद्दे पर आते हैं। बात हो रही थी मतों की, ओपीनियन की, ना कि दिमाग की। फ़र्क है! आपके बेटे का मत है की आपका सहकर्मी सही आदमी नही है, और आपके सहकर्मी की बेटी का मत है कि आपका चरित्र सही नहीं। मेरे पड़ोसी का मत है कि आपकी पत्नी दिखावेबाज है। आपकी माँ का मत है कि आपका मित्र झगड़ालू है। आपका मत है कि मैं गिरी गयी हूँ और मेरा मत हैं कि आप पहले ही से बहुत गिरे हुए हैं, इसमें कुछ भी नया नहीं है ( मैं सामान्य तौर पर अपनी सोच को ऐसी जगह ले जा कर आपको आपके ही बारे में अपनी व्यक्तिगत राय देने से बचती हूँ क्योंकि मेरा मत है कि गिरे हुए लोगों नें हमेशा मुझे मजबूत बनाया है…आभार!) फिर क्या फर्क पड़ता है मैं गिरूँ या आप गिरें! कोई परिवर्तन नहीं होता। अभी कुछ ही दिन पहले मुल्ला जी खड़े-खड़े यूँ ही गिर गए ( बाबू सुखले गिर गइनी…!)। अगर इससे कुछ असर होता है ताे आपको अपना कमज़ोर पक्ष टटोलने की जरूरत है। दुनिया की इस दौड़ में जहाँ एक छोटा बच्चा जिसे चलना भी नहीं आता उसे भी लोग धक्के देते रहते हैं, ऐसे में जीवन का कोई हिस्सा पंगु होना किसी श्राप से कम नहीं। मिसाल के तौर पर आज अगर मैं अपने पति से तलाक लेने का निर्णय लेती हूँ तो इसमें आपका मत क्या स्थान रखता है? इसका निर्णय जीवन के मेरे अपने अनुभवों पर निर्भर करेगा। और फिर कल मैं यह निर्णय बदल दूँ तो? अगर आपका बेटा बारहवीं में आर्ट्स चुनता है तो साइंस को लेकर मेरे महान विचार उसके किस उपयोग के हैं? ये अलग बात है कि मतदाताओं के इस महान तंत्र में जहाँ आपके मतों की कोई जरूरत न हो, आपके मत व्यर्थ हों, मूल्यहीन, अप्रासंगिक हों वहाँ भी लोग मत दे ही डालते हैं। आपके व्यक्तिगत बातों के लिए आपका अपना मत जो कि आपके अपने अनुभवों से निर्देशित हो, बस वही जरूरी है और स्वस्थ जीवन का प्रतीक है। आप अच्छे-बुरे जैसे भी मत रखें इससे किसी के व्यक्तिगत निर्णय प्रभावित होंगे ये अपेक्षा रखना बेमानी है। अगर आप हमेशा दूसरों की जिंदगी के बारे में जानने के लिए मीडिया पर आश्रित रहते हैं तो बहुत संभावना है कि विषय कहीं आपकी जिन्दगी से जुड़ा हुआ है।

किसी दुष्कर्म के विरोध में उठना, शोषण के खिलाफ आवाज उठाना मेरे मत में अनिवार्य है पर शोषित का दमन भी स्वीकार्य नहीं। आप इसे जीवन में अपनाने की जगह इसमें अपने कल्पनाओं के प्रवाह को भी मोड़ दें तो ये एक खूबसूरत सा फ़िक्शन बन जाता है। अब यहाँ मेरा मत तो मेरे पास है पर अगर इन सब में कई और लोगों के मत मिला दें तो ऐसी मिली जुली खिचड़ी से मुझे इनडाईजेशन होने खतरा हमेशा बना रहता है। पर यह तो तय है कि किसी को उसकी राय बनाने से नहीं रोका जा सकता चाहे इसका सम्बन्ध उस व्यक्ति से हो या न हो। इसे व्यक्त करने का स्थान ही ज्यादातर विवाद का विषय बनता है। कुछ “शरीफ” किस्म के लोग – औरों के प्रति – अपना मत “गुप्त” स्थानों में “गुप्त” तरीके से व्यक्त करते हैं तो कुछ बेबाक़ किस्म के लोग मुल्ला नसरुद्दीन की तरह अपनी राय जाहिर करते हैं। कुछ समझदार लोग अपनी राय खुद तक रखते हैं तो कुछ विरले लोग मत नहीं बनाते।

कुल मिला कर मैं समझती हूँ कि अपना मत बनाएँ और नि:संकोच व्यक्त करें। आपके विचार और व्यवहार की तुलना से ही हमें आपके बारे में कुछ पता चलता है और आपको समझने में मदद मिलती है।

मतदाता अधिकार! जिन्दाबाद!

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Author:

A busy mom!