बारिश

हवा में तैरती निषिद्ध माटी की अपरिचित महक। अंदर घुलती मन की मस्ती और बौराये चरवाहे की अल्हड़ सी तान। निर्बंध अविरल बहता हुआ स्वर खींचता ले जा रहा था। मन की कितनी ही बेडि़याँ  निरंतर गिरती जा रही थीं। कुछ देर बाद थक कर पास की हरी दूब पर पेड़ की टेक ले कर निढाल हो गयी। मुड़ कर देखा गीली मिट्टी पर अपने पदचिन्ह। कब इतनी दूर चली आयी मैं! साथ बहते हुए, आत्म-विस्मृत सी। और तब जा कर मिला प्रकृति की गोद में यह सरल-समृद्ध एकांत। निर्दोष, विकारहीन और सम्पूर्ण। एकांत जिसे बाँटने का मन करे, एकांत जिसे बाँटना संभव नहीं। सब कुछ जगा-जगा सा और इस शांति में बहते हुए जीवन का नर्तन। कहीं कुछ अघटित हो रहा था बारिश के साथ. बहुत अलग..
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