मुझे तलाश रही है..

मुझे तलाश रही है थोड़ी सी ईमानदारी की,

जहाँ लोग हिन्दी समर्थन के नाम पर गालियाँ देने की बजाय बच्चों को हिन्दी माध्यम में पढ़ाते हों,

जहाँ हिन्दी में दो शब्द शुद्ध लिखना बहुत कठिन ना हो,

जहाँ हिन्दी बस अंग्रेजी न लिख पाने की मजबूरी का नाम ना हो,

जहाँ देश-प्रेम के नाम पर न अहंकार का नंगा नाच हो, ना ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन की नीच प्रवृति,

जहाँ महज कुछ सुविधाओं के लिए देश की पवित्र मिट्टी त्यागने वाले सभ्यता का स्वाँग न रचते हों,

जहाँ कूप-मंडूकता अच्छाई का मापदंड कतई ना हो

और ना दूसरों का चरित्रहनन, अपनी अयोग्यता और चरित्रहीनता छुपाने का सहज माध्यम,

जहाँ पूजा-अर्चना के बाद लोग भगवान को मंदिरों में छोड़ कर कुकर्मों में न लिप्त हो जाते हों,

जहाँ धन लोलुपता अनेक कुकर्मों को जन्म देने के बाद दूसरों के धन अर्जन में बाधक न बने,

जहाँ सिर्फ लिखने की ही सम्पूर्ण स्वतंत्रता ना हो बल्कि सुंदर और रचनात्मक लेखन की संस्कृति भी हो ,

जहाँ गुणों की परख और उसे अपनाने की योग्यता, सीखने की ललक और उसी की प्रतिस्पर्धा हो,

जहाँ लोग दूसरों पर कीचड़ उछालने की प्रतिस्पर्धा में डर से अपने बचाव में, बदबू से सरोबार उसी कीचड़ में डुबकियाँ न लगाते हों,

मुझे तलाश रही है थोड़ी सी ईमानदारी की,

अपने गिरेबान में झाँकने की हिम्मत रखने वालों की,

थोड़ी कम स्तरहीनता की……

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