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फिर चली मैं..

road

दूर तक नेपथ्य में कोई नहीं था,
आस में ढूँढा नहीं कोई  किनारा;
वो चलेगा साथ मेरे क्या यहाँ जो
ढूँढता आया है तिनकों में सहारा।

वेदना का घात मन में,
हा! लिए आघात मन में;
हाँ, नहीं खुद को बचाया
दस्यु जब अपने बने थे।

शब्द से निःशब्द तक मैं जा चुकी थी,
और उसके पार भी जाना मुझे था ;
मार्ग मेरा था बना मेरे लिए ही
दंश स्मृतियों का अनजाना नही था।

ईश्वरों की जाति होगी,
मनुज होना है कठिनतर।
ये रहा संकल्प मेरा
क्यूँ खड़े हो तुम निरुत्तर?

फिर रुकी मैं, फिर मुड़ी मैं,
फिर चली मैं, फिर चली मैं ।

~ स्मिता

चित्र आभार: गूगल

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