पंथ है पहचान मेरी

स्वयं की संभावना की डोर थामे बढ़ चली मैं;
इक सिरा कर में लिया और पंथ को ही ध्येय माना।

अनुभवों का स्वाद लेकर सीखने पहचानने सा;
नित नया, नूतन-चिरंतन है बहुत कुछ जानने सा।

स्वयं में आनन्द ही है, टूटना फिर बिखरना भी;
जानना फिर मिटा देना और फिर से जानना भी।

पृथक कुछ भी है नहीं, अवरोध भी तो मार्ग ही है;
तिरस्कारों से बहुत आगे कहीं है लक्ष्य मेरा ।

भीड़ का हिस्सा बनूँ यह चाह मेरी कब रही है ?
सहमति बन कर रहेगी, शर्त ऐसी कब रही है?

मतों का हो भेद या फिर व्यक्ति की अवमानना हो;
अहंकारों को लगे चोटों का मुझको भान ना हो।

हो जहाँ सबकुछ तिरस्कृत बस वहाँ से बढ़ चली मैं;
पंथ से कुछ भी नही है भिन्न अब पहचान मेरी ।

क्यूँ डरूँ गिरने से मैं या टूटने से, बिखरने से?
बिखरता संगीत भी है, गंध भी और ज्ञान भी है;

ना कोई है चाह कि वापस मुड़ूँ और लौट जाऊँ
बस यूँ ही गिरते हुए उठती रहूँ, बढ़ती ही जाऊँ;

और क्या है ध्येय? पाना और खोना क्या यहाँ पर?
बोध जिसका भी रहा है क्षणिक ही है, घोर नश्वर।

इन क्षणों में ठहरने की गहन हो अनुभूति मेरी
परिभाषाओं से परे हो पंथ मेरा सृजित-निर्मित।

~ स्मिता

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